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Bhajan

कामिल काम कमाल किया

by Sant Brahmanand

कामिल काम कमाल किया, तैंने ख्याल से खेल बनाय दिया॥

नहिं कागज कलम जरूरत है, बिन रंग बनी सब मूरत है।

इन मूरत में इक सूरत है, तैंने एक अनेक दिखाय दिया॥

जल बूंद को लेकर देह रची, सुर दानव मानव जीव जुदा।

सबके घट अन्दर मंदिर में, तैंने आप मुकाम जमाय दिया॥

कोई पार न वार अधार बिना, सब विश्व चराचर धार रहा।

बिन भूमि मनोहर महल रचा, बिन बीज के बाग लगाय दिया॥

सब लोकन के नित संग रहे, फिर आप असंग स्वरूप सदा।

‘ब्रह्मानन्द’ आनन्द भयो मन में, गुरुदेव अलेख लखाय दिया॥

Meaning / Bhavarth

भावार्थ (Hindi Meaning)

“कामिल काम कमाल किया, तैंने ख्याल से खेल बनाय दिया॥”

हे परमात्मा, तूने ऐसा अद्भुत और अनूठा कार्य किया है कि केवल अपने विचार (ख्याल) से ही यह सारा सृष्टि रूपी खेल रच दिया।

 

“नहिं कागज कलम जरूरत है, बिन रंग बनी सब मूरत है। इन मूरत में इक सूरत है, तैंने एक अनेक दिखाय दिया॥”

इस सृष्टि की रचना के लिए न कागज़ की और न कलम की आवश्यकता पड़ी; बिना किसी रंग के ही ये सभी रूप-आकृतियाँ बन गईं। यूं तो अनेक रूप दिखते हैं, परंतु इन सबके भीतर एक ही सच्चा स्वरूप छिपा है — तूने अपने आपको एक होते हुए भी अनेक रूपों में प्रकट कर दिया।

 

“जल बूंद को लेकर देह रची, सुर दानव मानव जीव जुदा। सबके घट अन्दर मंदिर में, तैंने आप मुकाम जमाय दिया॥”

एक जल की बूंद से ही तूने भिन्न-भिन्न शरीर रच दिए — देवता, दानव, मनुष्य और अन्य जीव सब अलग-अलग बना दिए। फिर भी हर एक के हृदय रूपी मंदिर में तू स्वयं ही निवास करता है।

 

“कोई पार न वार अधार बिना, सब विश्व चराचर धार रहा। बिन भूमि मनोहर महल रचा, बिन बीज के बाग लगाय दिया॥”

बिना किसी आधार के न कोई पार है न कोई छोर, फिर भी यह संपूर्ण चल-अचल जगत तूने ही धारण कर रखा है। बिना भूमि के ही तूने एक सुंदर महल खड़ा कर दिया और बिना बीज बोए ही एक बगीचा लगा दिया।

 

“सब लोकन के नित संग रहे, फिर आप असंग स्वरूप सदा। 'ब्रह्मानन्द' आनन्द भयो मन में, गुरुदेव अलेख लखाय दिया॥”

तू सभी लोकों और जीवों के सदा साथ रहता है, फिर भी तेरा वास्तविक स्वरूप सदा असंग (निर्लिप्त) ही रहता है। 'ब्रह्मानन्द' कहते हैं कि जब गुरुदेव ने मुझे इस अलेख (अवर्णनीय, निर्गुण ब्रह्म) का दर्शन-ज्ञान करा दिया, तब मेरे मन में गहरा आनंद उत्पन्न हो गया।

 

सार रूप में: यह भजन ईश्वर की अद्भुत सृष्टि-रचना, उसकी सर्वव्यापकता, और उसके निर्लिप्त निर्गुण स्वरूप का बोध कराता है, जो केवल गुरु-कृपा से ही समझ में आता है।

English Translation

The Perfect Doer has wrought a wondrous deed — You fashioned this entire play merely through a thought.

 

No paper or pen was ever needed; every form here is made without any colour or paint.

Yet within all these forms lies but one true Form — You alone have shown Yourself as many.

 

Taking a mere drop of water, You shaped bodies — gods, demons, humans, creatures, all made distinct.

Yet inside the temple of every heart, You Yourself have quietly made Your abode.

 

Without any support there is no near shore or far — yet the whole animate and inanimate world is held by You.

Without land You raised a beautiful palace; without a seed You planted a garden.

 

You remain ever present with every world and being, and still Your true form stays ever untouched, unattached.

Says Brahmanand: joy has arisen in my mind — my Gurudev has revealed to me the Formless, the Indescribable.

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