ऐसी करी गुरुदेव दया, मेरा मोह का बंधन तोड़ दिया॥
दौड़ रहा दिन रात सदा, जग के सब कार बिहारण में।
स्वप्ने सम विश्व दिखाय मुझे, मेरे चंचल चित्त को मोड़ दिया॥
कोई शेष गणेश महेश रटे, कोई पूजत पीर पैगंबर को।
सब पंथ गरंथ छुड़ा करके, इक ईश्वर में मन जोड़ दिया॥
कोई ढूंढत है मथुरा नगरी, कोई जाय बनारस बास करे।
जब व्यापक रूप पिछान लिया, सब भर्म का भंडा फोड़ दिया॥
कौन करूं गुरुदेव की भेंट, न वस्तु दिसे तिहुं लोकन में।
‘ब्रह्मानंद’ समान न होय कभी, धन माणिक लाख करोड़ दिया॥
Meaning / Bhavarth
यह भजन संत ब्रह्मानंद जी की रचना है, जिसमें वे गुरु की कृपा से मोह-माया के बंधन टूटने, सभी मत-पंथों से ऊपर उठकर एक ईश्वर को पहचानने, और भ्रम मिटने के दिव्य अनुभव को व्यक्त करते हैं।
“ऐसी करी गुरुदेव दया, मेरा मोह का बंधन तोड़ दिया”
गुरुदेव ने ऐसी कृपा की कि मेरे मोह-माया का सारा बंधन ही तोड़ दिया।
“दौड़ रहा दिन रात सदा, जग के सब कार बिहारण में। स्वप्ने सम विश्व दिखाय मुझे, मेरे चंचल चित्त को मोड़ दिया”
मैं दिन-रात सदा संसार के कामों और भोग-विलास में दौड़ता-भागता रहता था। गुरु ने मुझे यह संसार स्वप्न के समान क्षणभंगुर दिखाकर मेरे चंचल मन को सांसारिकता से मोड़कर अंतर्मुखी कर दिया।
“कोई शेष गणेश महेश रटे, कोई पूजत पीर पैगंबर को। सब पंथ गरंथ छुड़ा करके, इक ईश्वर में मन जोड़ दिया”
कोई शेषनाग, गणेश या महेश (शिव) का जाप करता है, तो कोई पीर-पैगंबर को पूजता है। परंतु गुरु ने मुझसे सभी पंथ-भेद और ग्रंथों के आग्रह को छुड़ाकर मेरे मन को एक ही ईश्वर में जोड़ दिया, यानी सारे भेदभाव मिटाकर एकत्व का बोध कराया।
“कोई ढूंढत है मथुरा नगरी, कोई जाय बनारस बास करे। जब व्यापक रूप पिछान लिया, सब भर्म का भंडा फोड़ दिया”
कोई ईश्वर को मथुरा नगरी में ढूंढता है, तो कोई बनारस (काशी) में जाकर बसता है। परंतु जब मैंने ईश्वर के सर्वव्यापी रूप को पहचान लिया कि वह हर जगह है, तो सारे भ्रम का पर्दा फूट गया।
“कौन करूं गुरुदेव की भेंट, न वस्तु दिसे तिहुं लोकन में। 'ब्रह्मानंद' समान न होय कभी, धन माणिक लाख करोड़ दिया”
मैं गुरुदेव को क्या भेंट दूं, जब तीनों लोकों में उनके समान कोई वस्तु ही दिखाई नहीं देती। 'ब्रह्मानंद' कहते हैं — चाहे कोई लाखों-करोड़ों का धन-माणिक भी दे दे, फिर भी गुरु की कृपा के समान कभी नहीं हो सकता।
सार रूप में: यह भजन गुरु-कृपा की महिमा, सांसारिक मोह-माया से मुक्ति, सभी मत-पंथों से ऊपर उठकर एक ईश्वर की पहचान, और गुरु के उपकार को किसी भी धन-संपत्ति से न चुकाए जा सकने के भाव को व्यक्त करता है।
This bhajan by Sant Brahmanand expresses the glory of the Guru's grace — freeing the seeker from worldly attachment, rising above all sects and scriptures to recognize the One God, and realizing that nothing can ever repay the Guru's boundless kindness.
“Such was the grace my Guru bestowed, that he broke my bonds of attachment”
The Guru's grace freed the poet completely from the bondage of worldly attachment (moh-maya).
“I used to run day and night in worldly affairs; he showed me the world as a dream”
Once restlessly chasing worldly pleasures, the poet was shown by the Guru that this world is as fleeting as a dream, turning his mind inward.
“Some worship Shesh, Ganesh, or Mahesh; others worship saints and prophets”
People follow many different deities and paths, but the Guru freed the poet from sectarian divisions and united his mind with the One formless God.
“Some search for Him in Mathura, others settle in Banaras”
While others seek God in specific holy cities, the poet realized God's all-pervading presence everywhere, which shattered every illusion.
“What can I offer my Guru? Nothing in the three worlds compares to him”
Brahmanand concludes that no wealth or jewels, however vast, could ever equal the value of the Guru's grace.
In essence: This bhajan glorifies the Guru's grace in freeing the soul from worldly illusion, transcending sectarian divides to recognize the One all-pervading God, and acknowledges that the Guru's kindness is beyond any material repayment.